आपने देखा है बिहार का ताजमहल? यदि नहीं तो देखिए पावापुरी का जलमंदिर
पावापुरी। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की निर्वाण भूमि पावापुरी जैन धर्मावलंबियों का आस्था का केंद्र है। यह नालंदा जिला मुख्यालय से करीब 11 किमी दूर है। यहां सालों भर देश-विदेश के श्रद्धालु आते रहते हैं। हर साल दीपावली के मौके पर भगवान महावीर की विशेष पूजा की जाती है।
इसमें भाग लेने के लिए कई देशों के श्वेताम्बर व दिगंबर जैन श्रद्धालु आते हैं। कार्तिक अमावस्या की मध्य रात्रि में भगवान महावीर का निर्वाण हुआ था। जैनियों के 24 वें तीर्थंकर भगवान महावीर की निर्वाण स्थली पावापुरी में अंतिम संस्कार भूमि पर जल मंदिर बना हुआ है. महावीर के बड़े भाई नंदीवर्धन ने इस मंदिर का निर्माण कराया था जिसपर पूनमचंद सेठिया ने संगमरमर मढ़वाया.
अपने स्थापत्य के लिए मशहूर इस मंदिर को बिहार का ताजमहल कहा जाता है. इसका कारण यह है कि जहां ताजमहल किसी की याद में बनाया गया वहीं यह मंदिर भी महावीर की याद में बनाया गया है. दोनों अंतिम संस्कार भूमि पर अवस्थित है. दोनों का स्थापत्य भी अप्रतीम है और जिस संगमरमर पत्थर मकराना से ताजमहल बना है उसी पत्थर से बिहार का यह जलमंदिर भी बना हुआ है.
जानिए क्यों खास है जलमंदिर
-जलमंदिर भगवान महावीर की निर्वाण स्थली है.
-84 बीघे के तालाब के बीच सफेद संगमरमर का मंदिर ताजमहल की तरह दिखाई देता है।
- इस मंदिर में भगवान महावीर और उनके दो शिष्यों की चरण पादुका रखी हुई है।
-पूरे विश्व में रह रहे जैनियों के लिए यह तीर्थ मक्का के समान है।
-जलमंदिर के बारे में काका कालेलकर ने कहा था कि यहां असीम शांति मिलती है।
एक किलो से लेकर 51 किलो का चढ़ता है लड्डू : भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के दिन लड्डू चढ़ाने की परंपरा है। यहां एक किलो से लेकर 51 किलो (सवा मन) तक लड्डू चढ़ाए जाते हैं। इसके लिए खास तौर पर कारीगर बिहारशरीफ के साथ ही अन्य शहरों से पहुंचते हैं। जैन श्वेताम्बर और दिगंबर प्रबंधन की देखरेख में लड्डू का निर्माण किया जाता है। लड्डू बनाने में शुद्ध घी का इस्तेमाल किया जाता है । जैन श्रद्धालु लड्डू को अपने माथे पर लेकर निर्वाण स्थली से लेकर अंतिम संस्कार भूमि जहां पर प्रसिद्ध जलमंदिर बना हुआ है वहां तक जाते हैं और उसे अर्पित करते हैं।
16 रुपये मन लगती है घी की बोली : भले ही जीएसटी के कारण घी महंगा हो चुका है, लेकिन पावापुरी में भगवान महावीर की आरती के लिए 16 रुपये प्रति मन घी की बोली अब भी लगती है। एक मन में चालीस किलो होते हैं तो इसे इस प्रकार समझ सकते हैं कि 16 रुपये में चालीस किलोग्राम यानी 40 पैसे प्रति किलो। जैन परंपरा में अभी भी इसका पालन किया जा रहा है।
भगवान महावीर के निर्वाणोत्सव पर देश और विदेश के जैन धर्मावलंबियों की दिली इच्छा होती है कि वे भगवान महावीर के मंगल दिवस और आरती पर घी की ज्यादा से ज्यादा बोली लगाएं और पुण्य पाएं। इस कारण यहां घी की बोली लगाने के लिए प्रतिस्पर्धा होती है और उसी प्रतिस्पर्धा में सैकड़ों मन घी की बोली लगायी जाती है। बोली की राशि जैन प्रबंधनों को सौंपा जाता है।
दिवाली की रात में हिलता है महावीर की चरण पादुका का छत्र :
निर्वाण भूमि में जैन श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ यहां एक विशेष मान्यता के कारण जुटती है। मान्यता है कि भगवान महावीर की अंतिम संस्कार भूमि जलमंदिर, जहां पर अभी भगवान की चरण पादुका उनके दो शिष्यों गौतम स्वामी और सुधर्मा स्वामी के साथ अवस्थित है वहां भगवान महावीर की चरण पादुका का छत्र दिवाली की मध्य रात्रि को हिलता-डुलता है और इस दृश्य को जो भी जैन श्रद्धालु देखते हैं उनका जीवन धन्य हो जाता है।
इस दृश्य को ही देखने के लिए हजारों श्रद्धालु यहां रात भर टकटकी लगाये रहते हैं। इसी उपलक्ष्य में हर साल दीपोत्सव पर यहां जैन श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है। खास यह कि जलमंदिर (अग्नि संस्कार भूमि) में लड्डू चढ़ाने के लिए श्वेताम्बर व दिगंबर श्रद्धालुओं के बीच अलग-अलग बोली लगती है। दोनों संप्रदायों में अलग-अलग जो ज्यादा बोली लगाते हैं उन्हें सबसे पहले निर्वाण लड्डू चढ़ाने का मौका मिलता है।









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